रैंकिंग नंबर 3900
कैट, आईआईटी जेईई और सीबीएसई बोर्ड आदि में शीर्ष पर आने वाले छात्रों की तसवीरें अखबारों में खूब छपती हैं। पहली, दूसरी यहां तक कि दसवीं रैंकिंग तक लाने वाले छात्रों और उनके अभिभावकों के चित्र और समाचार छपना बहुत आम है, और ऐसी प्रेरणादायक खबरें छपनी भी चाहिए। लेकिन अगर कोई अखबार 900 वीं रैंकिंग लाने वाले छात्र का चित्र छापे तो शायद आपको अटपटा लगेगा। मगर जरा ठहरिये... अगर 3900 वीं रैंकिंग लाने पर कोई राष्ट्रीय अखबार दो कॉलम का चित्र प्रकाशित करे तो उसे क्या कहेंगे? नवभारत टाइम्स ने यही किया है।
छात्र की मेहनत और उपलब्धि का अपना महत्व है। वह इसके लिए बधाई का पात्र है। लेकिन क्या एक राष्ट्रीय अखबार में फोटो छपने के लिए यह इतनी महत्वपूर्ण रैंकिंग है? यदि हां, तो इससे पहले के 3899 छात्रों ने क्या बिगाड़ा है, उनके चित्र क्यों न छपें?


13 Comments:
ho sakta hai is exam me is ranking par aa kar bhi kuchh achhe options milte hon.....Think Positive.
राकेश जी, बात सकारात्मक या नकारात्मक सोच की नहीं, न्यूज वेल्यू की है। छात्र ने तो अपने हिसाब से अच्छा ही किया है। लेकिन पूरे देश का प्रतिनिधित्व करने वाले अखबार के लिए 3900वीं रैंकिंग इतनी महत्वपूर्ण कैसे हो सकती है?
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Baalendu Ji,
आपको जानकर खुशी होगी कि तस्लीम (ts.samwaad.com) परिवार NCSTC के सहयोग से 'ब्लाग लेखन के द्वारा विज्ञान संचार' विषयक 4 दिवसीय कार्यशाला का आयोजन लखनऊ में करने जा रहा है। उक्त कार्यशाला हेतु विषय विषेशज्ञ (यात्रा भत्ता एवम मानदेय NCSTC के अनुसार) के रूप में आपका नाम प्रस्तावित है। कृपया इस हेतु अपनी सहमति प्रदान करने का कष्ट करें।
सादर
ज़ाकिर अली रजनीश
zakirlko@gmail.com
Aapke home page se mail na ho pane ke karan yahaa pe sandesh chhodna pada.
good
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कुछ नहीं भाई, आपने ठीक नोटिस किया है.
पैसा बोलता है...........
लेखन के लिये “उम्र कैदी” की ओर से शुभकामनाएँ।
जीवन तो इंसान ही नहीं, बल्कि सभी जीव जीते हैं, लेकिन इस समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, मनमानी और भेदभावपूर्ण व्यवस्था के चलते कुछ लोगों के लिये मानव जीवन ही अभिशाप बन जाता है। अपना घर जेल से भी बुरी जगह बन जाता है। जिसके चलते अनेक लोग मजबूर होकर अपराधी भी बन जाते है। मैंने ऐसे लोगों को अपराधी बनते देखा है। मैंने अपराधी नहीं बनने का मार्ग चुना। मेरा निर्णय कितना सही या गलत था, ये तो पाठकों को तय करना है, लेकिन जो कुछ मैं पिछले तीन दशक से आज तक झेलता रहा हूँ, सह रहा हूँ और सहते रहने को विवश हूँ। उसके लिए कौन जिम्मेदार है? यह आप अर्थात समाज को तय करना है!
मैं यह जरूर जनता हूँ कि जब तक मुझ जैसे परिस्थितियों में फंसे समस्याग्रस्त लोगों को समाज के लोग अपने हाल पर छोडकर आगे बढते जायेंगे, समाज के हालात लगातार बिगडते ही जायेंगे। बल्कि हालात बिगडते जाने का यह भी एक बडा कारण है।
भगवान ना करे, लेकिन कल को आप या आपका कोई भी इस प्रकार के षडयन्त्र का कभी भी शिकार हो सकता है!
अत: यदि आपके पास केवल कुछ मिनट का समय हो तो कृपया मुझ "उम्र-कैदी" का निम्न ब्लॉग पढने का कष्ट करें हो सकता है कि आपके अनुभवों/विचारों से मुझे कोई दिशा मिल जाये या मेरा जीवन संघर्ष आपके या अन्य किसी के काम आ जाये! लेकिन मुझे दया या रहम या दिखावटी सहानुभूति की जरूरत नहीं है।
थोड़े से ज्ञान के आधार पर, यह ब्लॉग मैं खुद लिख रहा हूँ, इसे और अच्छा बनाने के लिए तथा अधिकतम पाठकों तक पहुँचाने के लिए तकनीकी जानकारी प्रदान करने वालों का आभारी रहूँगा।
http://umraquaidi.blogspot.com/
उक्त ब्लॉग पर आपकी एक सार्थक व मार्गदर्शक टिप्पणी की उम्मीद के साथ-आपका शुभचिन्तक
“उम्र कैदी”
paisa aur khas jaan pahchan se kuch bhi sambhav hai?
ek jaane pahchane wale akhbar ka yah kritya bahut bura hai...
आई आई टी में सेलेक्शन हो जाना अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है | प्रायः ७०००-८००० तक की रैंकिंग वालों का सेलेक्शन हो जाया करता है | यह बच्चा भी उन प्रतिभावान बच्चों में है |
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