Tuesday, February 26, 2008

इस बहाने स्व. मुकेश को ही याद कर लेते

जोश-18 के मुखपृष्ठ पर खबर छपी है- नील मुकेश की दादी का निधन। फोटो दादी का नहीं बल्कि नील मुकेश का लगा है। यहां कई सवाल एक साथ उभरते हैं। पहली बात तो यह कि क्या नील मुकेश की दादी पाठकों के लिए इतनी महत्वपूर्ण हैं, जब खुद नील मुकेश ही महत्वपूर्ण नहीं हैं? दूसरे, लेखक ने इस खबर को फिल्म सेक्शन की लीड बनाने को जस्टीफाई करने के लिए साथ में लिख दिया है कि नील को अपनी दादी से बेहद लगाव था। यानी इस आधार पर यह पहले पेज की प्रमुख खबर हो गई। क्या आप इससे सहमत हैं?

अब तीसरी बात। नील मुकेश की दादी सरल के साथ शायद ज्यादा न्याय होता यदि जोश ने यह लिखा होता कि गायक नितिन मुकेश की मां का निधन या फिर अमर गायक स्व. मुकेश की पत्नी का निधन। अब या तो उन्हें इसका पता नहीं, या फिर वे नील मुकेश को स्व. मुकेश से ज्यादा महत्वपूर्ण मानते हैं। अगर स्व. मुकेश का जिक्र किया होता तो खबर को जस्टीफाई करने की जरूरत ही कहां थी।

8 Comments:

At 5:59 PM, Blogger Yunus Khan said...

वाह बालेंदु जी क्‍या दृष्टि है । सही पकड़ा आपने । मीडिया कितना लापरवाह और बचकाना हो सकता है इसकी एक मिसाल सुनिए । नौशाद के निधन पर तमाम चैनलों ने पाकीज़ा के उन गानों के वीडियो दिखाए जो नौशाद के है ही नहीं गुलाम मोहम्‍मद के बनाए हुए हैं । गुलाम मोहम्‍मद के वारिसों ने किसी चैनल से कहा-भाई क्‍या कर रहे हो तब उन्‍हें होश आया । बाक़ी चैनल लगे रहे अपनी रौ में । तो ये हाल है ।

 
At 7:20 PM, Blogger मुनादीवाला said...

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At 7:39 PM, Blogger Tarun said...

aap bahut sahi cheeche pakar ke laate hain, humne bhi is baar aisa hi kuch pakar ke apni site me post kiya hai, Sweeps ka matlab agar aapko pata hai to aap bhi aakar bata jaaiye.

 
At 8:30 PM, Blogger Udan Tashtari said...

सत्य वचन, बालेन्दु जी.आपसे सहमत हूँ.

 
At 9:32 PM, Blogger संजय बेंगाणी said...

पत्रकार आजके जमाने का है, बेचारा नील को जानता है, उसके के लिए नील की दादी मरी है, तो वही लिखेगा ना. ज्यादा अपेक्षा काहे करें.

 
At 1:08 PM, Anonymous Anonymous said...

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At 7:42 PM, Anonymous Anonymous said...

Attention!

 
At 10:42 AM, Blogger सोनू said...

जोश-18 का झूठ तो देखिए, कहता है कि ये हिंदी की सबसे बड़ी साइट है। हिंदी की पहली साइट वैबदुनिया को ही देख लो, इसी के जैसी है पर इससे तो बड़ी है। ऐडों पर पैसा ख़र्च कर रहे हैं, और संजीदगी नाम की कोई चीज़ ही नहीं है।

ख़ैर, आपके "जस्टिफाई करना" जुमले से नाराज़ हूँ। इसकी जगह आप "मुनासिब ठहराने के लिए" भी बरत सकते थे। और शुद्ध हिंदी (जिससे मैं परहेज़ करता हूँ) का "औचित्य" भी इस्तेमाल कर सकते थे। और थोड़े उर्दूदाँ हैं तो "मुनासबत"(जो कि मुनासिब से ही बना है) जस्टिफिकेशन या रैलेवैन्स के सही तर्जुमा है। सुमित।

 

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